ऐ ज़िन्दगी..

कुछ इस तरह ललकारा ज़िन्दगी ने हमारे वजूद को,
की ठान लिया हमने भी, चल अब दो-दो हाथ हो ही जाए…

ऐ ज़िन्दगी..
गर मेरे हर बढ़ते कदम पर,
तू अपनी डोर से पीछे खींच भी लेगी,
मैं समझूंगा तेरा-मेरा बंधन और मज़बूत हो गया….

ऐ ज़िन्दगी..
तू बिछा के तो देख कांटे मेरी राह में,
मुझे काँटों से भी गुलिस्तां बनाना आता है…

ऐ ज़िन्दगी..
तू दुश्मनी निभाने के बहाने मिल तो सही,
तुझे एक राज़ की बात बताऊँ…
दोस्त तो हैं, पर हैं गिने-चुने..
तेरे बहाने, हमें दुश्मनों से ही मिलने का सुरूर मिल जाये
चल अब दो-दो हाथ हो ही जाए…
चल अब दो-दो हाथ हो ही जाए…

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