फिर…

फिर क्यों न तितली पकड़ें हम,
फिर क्यों न पतंग उड़ाएं हम,
उन कोने वाले खेतों से,
फिर क्यों न गन्ने चुराएं हम…

क्या याद है उस माली का चेहरा,
रखता था जो बागों पे पहरा,
सो जाए अगर वो आज दोपहर,
फिर क्यों न शोर मचाएं हम…

बौछार गिरे फिर बारिश की,
हो ओलों की फिर बरसातें,
उन नन्हे-मुन्ने पैरों से,
फिर क्यों न उछालें-कूदें हम…

चलो ढूंढें गिल्ली-डंडे को,
ढूढ़ें हम छुपन-छुपाई को,
चलो भागें, दौड़ें, पकड़ें हम,
फिर गिरें, और फिर संभालें हम…

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  1. Nanda 28/01/2016

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