मिलना मुनासिब अब नहीं

1-
मिलना मुनासिब अब नहीं
लगती हमें रोटी,
घास भी खाने लगूं
खाने न देंगे वो।

2-
होने लगा क्यों उन्हें
भूख से परहेज,
रिश्वत तराजू पे हुई
नापतोल अध्याय।

3-
उनसे भला क्या पूछते
जिनके न दरो-बाम,
आबरु की बात पे
नजरें तीर-कमान।

4-
उसने कहा मुझसे बहुत
हम खुदा के द्वार,
लेकर चलेंगे क्या कहो
बदमाशियां अपनी?

5-
रहना अगर आपको
हसरतो-उम्मीद से,
लुटते रहो लुट भी
करते रहो नाम।

6-
उछालिए संग कि गिरे
आसमां से आगे,
दूरियोँ के मुकाबिल
होंसला अपना।

7-
चटकी हुई मीनार पे
महफिलों का रंग,
ढ़हने पे शुमार होगा
साजो-सामान मेरा।

8-
वाह री औरत तेरी
किस्मत का तकाज़ा,
खुद कारखाना ओ
कारखाने में खुद।

9-
आखिर बला है क्या बला
कि मुस्कुरा देना,
एक दीद में इक लख मजा
हो सामने जन्नत न हो।

10-
चाहना उनको रहा
करना ख़ता कोई,
आशिकी में आदमी
नाहक ही बदनाम।

11-
होता यहाँ इंसाफ गर
तब कहाँ मजनूं,
राही,मीर,गालिब तलक
पीने लगे शराब।

12-
बेपरवाह जुल्फ यूँ
झटका न कर जालिम,
मचल उठे दिल कहीं
बाबला होकर।

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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