चार पहर ज़िन्दगी के…

कुछ और गहरा होने दो इस शाम को,
दोपहर को अंगड़ाई लेने तो दो..
अभी छेड़ो नहीं नए साज़ तुम,
पुरानी धुन को रूह सहलाने तो दो…

धुन्दला नज़र आता है आईने में जो चेहरा
उस चेहरे को इक पहचान पाने तो दो..
जिन ख्वाबों को देखकर बीते हैं ये बरस,
उन ख्वाबों को हक़ीक़त बनने तो दो…

नवाजो ज़िन्दगी को ज़ेहनी और जिस्मानी मशक्कत से,
पेशानी से पसीने की बूँदें बहने तो दो…
इक-दूजे से टकराकर उलझी थी जो लकीरें बंद मुट्ठी में,
उन्हें खुली हथेली पर अपनी राहें चलने तो दो…

मिली है फुर्सत बरसों की जद्दो-जहद से
कुछ अरसा सुकून लेने तो दो…
अभी तो बस सांस लेना शुरू किया है,
कुछ देर जी भर के जीने तो दो…

2 Comments

  1. rakesh kumar rakesh kumar 22/08/2014
    • Garima Mishra Garima Mishra 23/08/2014

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