रंज गर अल्फ़ाज में

1-
रंज गर अल्फ़ाज में
मुस्कुराना क्या,
दिल खुशमिज़ाज तो
खिलखिला उठिए।

2-
उसने न की बात फिर
इंकार जो किया,
कान भी पकड़े न थे
आकर लिपट गई।

3-
चलता नहीं सिक्का यहाँ
तेरी क्या मज़ाल,
गिरीबां-ए-गरीब पे
खन्जर चला होगा।

4-
तुमने तलाशा कब मुझे
लेकिन कहाँ होगा,
दीवार पे लटकी हुई
तस्वीर खस्ताहाल।

5-
बदलीं नहीं महफिलें
बदले वफ़ा के दौर,
औरतों की सिसकियां
दौर-ए-नमाज में।

6-
उसने सँवारी जुल्फ जो
आईने मेरे,
शाम से ही धुत्त थे
तकिए रजाई में।

7-
इश्क में हर दाँव का
हारना मेरा,
कह रहा कि जीत लो
मंजिलें अपनी।

8-
कत्ल से करने लगे
क्योंकर कोई गुरेज,
वैद्यता की हर मुहर
जिनकी गवाही में।

9-
लुट गई बर्बाद थी
आबरु जिसकी,
लेकिन उनकी संगति
आदमी हूँ मैं।

10-
उसने कहा कि ठीक हम
लेकिन दबी जुबान,
बर्बादियोँ का ये कहर
कि कांपती आवाज।

11-
अंजाम-ए-कुर्बानी
मालूम हमें,
बेजा नहीं गमे-मर्ग पे
मुस्कुरा देना।

12-
मांगती मुझसे मुझे
इंकार क्यों भला,
नखरे रहे माशुक के
ज्यों जाट की बारात।

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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