आज का नवयुवक

आज का नवयुवक

अजीब हाल में दिखता आज का नवयुवक
जागा है मगर कुछ खोया खोया सा
हँसता है पर कुछ रोया-रोया सा
जीवन संघर्ष की इस दौड़ में
जा रहा किस डगर
नही खुद को भी खबर

बस चलता जाता है
सुनसान सा, अनजान सा
अज्ञान सा बेजान, बेजुबान सा
खो गया है मंजिल अपनी
हुआ जाता है पथ भ्रष्ट भी

उत्थान की इस चकाचौंध में
सिमट कर रह गया मोबाइल की ओट में
खो रहा पहचान अपनी
पाश्चात्य संस्कृति की होड़ में

सम्भलो मेरे नौजवानो के वक्त अभी बाकी है
दुनिया को अपना कौशल दिखाना अभी बाकि है
घर से लेकर देश तक संभालना अभी बाकी है
करो पथ प्रदर्शित के गर्व से चलना अभी बाकी है

—-ःः डी. के. निवतियाँ ःः———

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