बड़ा खुद्दार था

(बड़ा खुद्दार था)***

कहता रहा कपटी मुझे, मुझे भी कहाँ इन्कार था
अजी मैं तो खुद अपनी ही नज़रों में गुनहगार था

मैंने लाख कोशिश की , वो मान जाए पर न माना
यारों इश्क़ के वायरल से वो भी तो बीमार था

अक्सर निकल जाता था मेरे सामने से छुपकर
मैं भूला पर वो नहीं, उस पर मेरा कुछ उधार था

बड़ी तबीयत से छला गया एक दिन अपनों से ही
मेरी ही तरह खुद को समझता बड़ा होशियार था

उसने तोड़ दिया मंदिर जैसा पवित्र दिल मेरा
जिसमे बरसों से बसता रब जैसा मेरा यार था

कैसे बचाता दूसरों को यारों जिल्लत से यहाँ
गुनाह और मेरे बीच बरसों से एक करार था

मिला है जो भी ‘रजत’ से कभी न कभी बोला खुद से
कुछ भी कह लो, पर बात है आदमी बड़ा खुद्दार था

_________गुरचरन मेहता ‘रजत’______________

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