मिलना मिलाना गैर से

1-॰
मिलना मिलाना गैर से
अपनी नहीं आदत,
लेकिन दरीचोँ से रहीं
नजदीकियां अपनीं।

2-
हमें क्या गम कि तू
जा रहा कब्र में सोने,
हमको नसीब कब रहे
रोजे-मुबारक ये?

3-
शाह-शहंशाह ही नहीं
मुसाहिब भी ‘मुकेश’,
बख्शते नहीं गर्दन
गरीब की नादां।

4-
बात न कर मुझसे
पता है मुझको,
माँ के कंधे पे इश्क
जताना तेरा।

5-
नहीं गम मौत का लेकिन
इजाफा इश्क में उसके,
बेवजह की मौत से तो
कर नहीं सकते।

6-
इश्क का अपना मजा
हम अपने मजे में हैं,
भला फिर गैर के आगोश में
दम तोड़ देवें क्यूँ?

7-
रिश्ते खड़े खन्जर लिए
कहते कि हम मौजूद,
लेकिन नहीं शर्म का
आँख में आँसू।

8-
इश्क गर होता नहीं
होते कहाँ आशिक,
होते मगर होती नहीं
इश्क की तौहीन।

9-
चाहिए तुमको कहो
इम्तिहां कैसा,
औरतों पे जुर्म की
हद रही होती।

10-
इंकार उसे पसन्द कब
हुक्म की तअमील,
आदमी का लफ्ज पे
इकरार ये कैसा?

11-
ये दिल तुम्हारा हो गया
उस दिल हमारा इश्क,
साँस की सरगोशियां ओ
मिजाज बदल गया।

12-
गया जो करीबे-इश्क
उड़ाकर पखेरू,
फाख्ते उड़ गए उस
हकीकत के यारब।

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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