ज़नाज़ा जो हुआ रुख्सत

1-॰
ज़नाज़ा जो हुआ रुख्सत
जुबां बेलफ्ज़ थी मेरी,
फबकते होंठ से निकला
खड़े हम भी तबाही में।

2-
छोड़ो बात शराब की
गर देख लेते हुस्न,
मयकदे का दर तुम्हें
फिर कहाँ मंजूर?

3-
शाह ओ शहंशाह के
व्यंग की चर्चा,
दोस्ती में गर्दनें
गरीब की नीलाम।

4-
मुनहसिर उनपे हुए
जिनको न कोई ढंग,
कहिए कि मेरे इश्क का
कैसा अक्स हो?

5-
अब नहीं कि मुझको देखनी
सूरत तेरी,
ख्वाब,दिलो-दिमाग पर
मेरा न कोई जोर।

6-
नरक की हर गली जिसको
पुकारे नाम ले करके,
बसेरा स्वर्ग में संभव
भला उस शख्स का कैसे?

7-
सज्दा इस जमीं को
इसी की कसम खाते हैं,
हम बेवतन होकर मगर
जीने नहीं देंगे।

8-
तबीयत मेरी लगती नहीं
लगता कि हुई खराब,
दिल जैसी चीज ओ
नाचीज से फरियाद।

9-
मशहूर हुए हैं वो
कत्ल करके मेरा,
कहिए कि सजा
मुज़रिम को मिलेगी।

10-
मुनाफा खामोश रहने में
नहीं इल्जाम का लगना,
हकीकत सामने हो तो
निगाहें क्या नहीं कहतीं।

11-
सूरत उनकी रही
जब तलक निगाह,
मुझको लगा कि सो रहूँ
सहर होने तक।

12-
आतिशकदां हैं दिलो-जां
कैद में उसकी,
बनी हो कोई दुल्हन
मेरे शौहर की।

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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