शराबी कबाबी का विश्वास

1-॰
शराबी-कबाबी का विश्वास
ऐ जमाने मत करना तू?
ये वो कालिख पुते बर्तन हैं
जिन्हें खूब रगड़ना तू,
कालिख छूट न पायेगी
बर्तन फूट जायेगा मगर,
अपने काम में लाने की कोशिश
ऐ जमाने मत करना तू।

2-
स्वयं पथभ्रष्ट
पत्नी पतिव्रता मिले,
वाह रे मानव तेरा
अजब है तरीका,
स्वयं जानता नहीं
जीवन के मायने सही,
औरों को बताने चला है
जीने का सलीका।

3-
विचार बिना बहिष्कार करे
मर्यादा तोड़े आँगन की,
पंचों में नीलाम करे जो
इज्जत अपने साजन की,
उस नार को क्या कहिए बोलो
वह नार सुहागिन कैसी है?
दुश्मन से भी निरा नीच
जहरीली नागिन जैसी है।

4-
दाद देती है दुनियां जो
गिरकर उठा,
खाक जिएगा चला जो
गिराकर नजर,
वो वक्त ही क्या
जिसे ठोकर न लगी,
कब संभला है कोई
उठाकर नजर।

5-
हराना हक है मगर
है बाजिब नहीं यारो,
गर्दने-मुफ़लिस पे
खन्जर नहीं मारो,
नहीं तो इम्तिहान जिन्दगी का
कहर बनकर टूटेगा,
बना जो उसकी मिट्टी से
जानो खाक नहीं यारो।

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