मैं अब बड़ा हो गया हूँ

मैं आज भी किनारों से
पूछता हूँ की तुम
वही हो जो
उस वक़्त थे
जब एक
मासूम
गली में कहीं
दांत किटकिटाते
खड़ा था अकेला
पेट की आंत
सिकुड़ रही थी
उदर की अग्नि से
लाचारी के बादल
आखों से
पानी बरसाते थे
बस बेबशी
गरीबी की
रुसवाई साथ थी
जमाने की
मेरा भी मन
दस्तक देता था
लज़ीज़ चीजों पर
आज हाथ जोड़े
खड़े हैं
कूंचे गलियारे
क्योंकि मैं अब
बड़ा हो गया हूँ

Leave a Reply