जहाँ दिवाली की लहरेँ

1-॰
जहाँ दिवाली की लहरें
करती थीं कल्लोल व्रह्द,
आज वहाँ सन्नाटे जैसा
जैसे बोल रहा कोई।

2-
रोकने की कोशिशें हैं
इश्क का इजहार,
गर करें वो इल्तजा
बेठिए हुजूर।

3-
जिस दिन कि उनको दे दिए
अपने सारे ख्वाब,
मुस्कुराने से मुझे
अब कहाँ फुर्सत?

4-
रोशनी का गम अगर
अँधेरे को लगे खलने,
तब मसीहा का खिताब
क्या खुदा लेगा?

5-
उस हसीं की रही
नीयत कोई भी,
आखिर वह भी मांस का
जीता सबूत थी।

6-
निकालें जूँ अगर सर से
नादां जिन्दगी जाए,
करें गर माफ ये हरकत
देकर जख्म खुजलाए।

7-
मजमूं इस तरह खोलो
निकले मुद्दआ कोई,
मुश्किल न हो बनाव
दस्तकारी का।

8-
होंसला माशुक का
बनकर कोई खबर,
कान में आ कह गया
आ रही हूँ मैं।

9-
हर साज पे गाते नहीं
हम कोई गजल,
हमको हमारी महफिलें
आबाद चाहिए।

10-
मैं नहीं जबाब
तेरे सिक्के का,
जिसे उछालो और
बदल जाए किस्मत।

11-
किसी का कुछ न बिगड़ेगा
इस तकदीर से आगे,
बनाकर हम खुदाया
उस हसीं को छोड़ देवें क्यूँ?

12-
बहुत बेआबरू हैं वो
इस दुनियां में यारब,
जो मयखाने में
मयख्वार बैठे हों।

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