हमनशीं के रहे

1-‘
हमनशीं के रहे
नखरे कि ढाई कोस,
मुकाम से मंजिल तलक
दूरियां ही दूरियां।

2-
की खुशामद तो
न दिया बोसा हमको,
पकड़ ली कलाई तो
शरमाके रह गए।

3-
गर ले लिया बोसा
क्या ख़ता कर दी,
देखते क्या तुम न थे
हमको हजारों बार?

4-
बोसा दे न दे मगर
मुस्कुरा तो दे,
ब-अंदाजे-इताव ठुनकना भी
अदा है तेरी।

5-
उन्होंने कहा कि मय हमें
लगती नहीं लज़ीज,
मुस्कुराते देख ली तो
चलने लगे दौर।

6-
देने लगे बोसा अगर
हर गली हर मोड़,
तब हमारे इश्क की
खुली दुकां न हो।

7-
गर बदलकर करवटें
न सो गया होता,
जिन्दगी सुलगती
दो दिन के प्यार में।

8-
हाँ यहाँ से हुस्न की
बारात निकली थी,
कुछ पटाखे बारूद के
बन धमाका बिखर गए।

9-
पड़े हैं बीमार तो कोई
देखने वाला नहीं,
ज़नाज़े पर दहाड़े मारकर
रोएगा कौन?

10-
बनाते हैं निशाना
इश्क के लुटेरे भी,
निकाह की तारीक ओ
बाजार का दाम।

शब्दार्थ-
1-बोसा/चुम्बन
2-ब-अंदाजे-इताव/
रौष के भाव से
3-तारीक/अंधकार

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