माशुक की फुफकार

1-‘
तलवार की हर धार पे
सनसनी लेकिन,
माशुक की फुफकार से
यमलोक में कोहराम।

2-
बिकता नहीं ईमान गर
करता खुदा की बात,
वो जन्नत मसीहा की नहीं
आदमी का दाम।

3-
न दर्द जिस चिराग में
कहाँ फिर रोशनी गोया,
मरे पे नसीब जन्नत
या,इशारा जिन्दगी का।

4-
बनाना गर हमें होता
मसीहा अपने दिल का तो,
कर खुदा की याद
खुदा का रूप दे देते।

5-
उतारो चाँद को नीचे
मगर ना आसमां उतरे,
उठाए जिसे सिर आदमी
वो मंजर कहाँ उतरे?

6-
नहीं शर्म जिसकी आँखों में
उसका कौन हो अपना,
दिल बद्दुआ देगा
ठगा जब जिसको जाएगा।

7-
कहते नहीं मगर करते हैं
तकाज़ा सद-हैफ़,
माँगने का आबरु भी
अनोखा ढंग है यारब।

8-
हुआ गर इश्क ही होता
भला क्यों दिल लगे दुःखने,
यहाँ हर आँख से
लावा बरसता बेवफ़ाई का।

9-
मैं बस्ती फ़कीरों की
यहाँ क्या माँगने निकला,
यहाँ तो आँख से आँसू
जुबां से सिसकियां बंटतीं।

10-
खुदा ने जिन्दगी बख्शी
सुधारो दीन तो अपना,
बँट गया मजहब यहाँ
और खुदा का नाम।

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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