माँ तो है माँ

वो कहती थी जीना सीखो, गिर-गिर कर फिर से उठना सीखो।
वो हार कभी न मानने वाली, हिम्मत से भी हिम्मत वाली।
लाचार अवस्था, लचर थी हालत, बोझ-भार बहुतेरा था,
चारों ओर अंधेरा था कायम, पर आँखों में उसकी सवेरा था।
जानें कैसी माटी की वो, ढ़लकर गिरना था पसंद नहीं,
एक एक गुलामी के क्षण को, उसने जीया स्वछंद वहीं।
आज उसी के भावों से मैं, सघन ऊर्जा पाता हूँ,
उसके चरणों में शीश नवाँ मैं, पर्वत-सा चढ़ जाता हूँ।

छोटे छोटे कामों में उसकी, सोच बड़ी ही होती थी,
कठिन परिस्थिति भी उसके सम्मुख, भर-भर बोझा ढोती थी।
वो एकदम निश्छल सोच को पाले, ऐसी बात बताती थी,
जिनको सुनकर उसकी इज्जत, हृदय में बढ़ जाती थी।
संस्कार उसी से हम सीखें, बर्ताव हमारा उसका था,
वो नहीं पढ़ीं थी ज्यादा किंतु, ज्ञान हमारा उसका था।
सोच सोच आदर्शों को मैं, गौरव से भर जाता हूँ,
उसके चरणों में शीश नवाँ मैं, पर्वत-सा चढ़ जाता हूँ।

कहने को एक शब्द है माता, अलंकार कितने इसमें,
कहने को एक जन है माता, रूप बसे कितने इसमें।
कहने को संबंध है माता, बंधन है कितने इससे,
कहने को नारी है माता, जान जनीं कितनी इसने।
कहना है माता को इतना, कितना प्यारा तेरा संग रहे,
रहना है चरणों में इतना, जब तक प्राण देह संग रहे।
कैसे तेरा कर्ज उतारूँ, मैं बस-बेबस हो जाता हूँ,
तेरे चरणों में शीश नवाँ मैं, पर्वत-सा चढ़ जाता हूँ।

अरुण जी अग्रवाल