बिना कोमा,विराम,हलन्त

उन्हें लिखने दो
जो लिखते हैं
साहित्यिक दायरे में
यथास्थान
कोमा,विराम,हलन्त
पूर्णतया व्यवस्थित
संपादित रचना।
परन्तु
जो अव्यवस्थित हैं
क्या उनकी व्यवस्था का
आकलन
सहज है?
उनके प्रति नहीं
उनका कोई उत्तरदायित्व
कि सराहें उन्हें
जिनकी जिन्दगी के चीथड़ों पर
लिखी जाती है कोई कविता।
और बिकती हैं
हजारों-हजार पुस्तकें
पर नहीं मिलता
उनकी बेचारगी
उस रुदन का खरीददार,
जो रो रहे हैं
अविरल
बिना कोमा,विराम,हलन्त।

9910198419

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