व्यवस्था का भटकाव

एक बार
हर टूटा व्यक्ति
वापिस लौटता है,
जिन्दगी की तलाश में,
जिसका भाव सहज हो
आधारभूत,मर्यादित।
जो मुमकिन नहीं
और लगा लेता है गले
उस विरोधाभास को
जिसका विरोध करता रहा
कुलक्षिन,
कभी वैश्या कहता रहा।
आज जाग्रत थी
उसी के अन्तर्तम
वही मूरत विक्षिप्त,
देवीस्वरूप,खूबसूरत।
विडम्बना नहीं कि-
‘व्यवस्था का भटकाव’
वैश्या को देवी
देवी को वैश्या कहता रहा
स्वार्थ के साथ बहता रहा।

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