कहाँ गए भैया-एक बहिन का दर्द – विनय भारत

कहाँ गए भैया
तुम मुझे
छोड़कर
क्या तुम्हे पता हैं
आज
अकेली हूँ मैं

इस राखी को
देख देख कर
रोती हूँ मैं

लगता है भैया
मुझे
अभी अभी तुम आओगे

मुझे चिढ़ाओगे

दस बातें मनवाओगे

फिर ये राखी
बंधवाओगे

तुम पहले नखरे करोगे

फिर दस रूपये दोगे

लेकिन मैं

हाँ भैया मैं

फिर से
तुम्हे पागल
बनाउंगी

तुम्हे पांच सौ
का नोट
दिखाउंगी
जो निकाला था
भैया मैंने

कल रात
तुम्हारी जेब से

फिर मैं तुम्हे
चिढाउंगी

तुम झगडा करोगे

गुस्सा करोगे

माँ
हमे डाटेगी

फिर हम हंसेगे

भैया
तुम पतंग उड़ाओगे

मैं चरखी पकड़ूंगी
तुम्हारी पतंग को
दूर
तक
देखती रहूँगी

पतंग कट जाएगी

तुम
गुस्सा हो जाओगे

मैं तुम्हे मनाउंगी

तुम मुझसे
उधार
पैसे मांगोगे
मुझे पता हैं
तुम कभी भी

वो पैसे नही
लौटाओगे

लेकिन तुम्हारी
एक हंसी

देखकर

मैं खुशहो जाउंगी

भैया तुम
चले गए हो
इतनी दूर

जहाँ से नही
आया कोई
जाकर वापस

भैया

तुम्हारी याद आती हैं

ये राखी का दिन
कब ढलेगा

कब सूर्यास्त होगा

ये सोंचकर ही
भैया
आँखे रोती
हैं
कैसे रोकूँ भैया अपने को

मन नही मानता

माँ रोती है

पापा मन ही मन घुटते हैं

भैया याद आता हैं
बचपन

वो लड़ाई झगडे

वो नटखटपन

भैया
आ जाओ एक बार
तुम्हे
राखी बंधना चाहती हूँ

तुम्हारे साथ झगड़ना चाहती हूँ

तुम्हारे कंधे
पर सर
रखकर रोना चाहती हूँ

एक बार तो
बताओ
भैया तुम कहां हो…

भैया तुम कहाँ हो…

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एक दिवगंत भाई की बहिन के लिए ये त्यौहार दुःख और अभिशाप बन जाता हैं
उफ़

कवि विनय भारत