‘भारतीय साहित्य જ્ઞાनमार्गी’

सूक्त ૠचाओं का संकलन,
‘मंगल’संहिता है कहलाती।
वाड़्मय संकलित साहित्य,
लंबे अंतराल में संकलित।
अनंत अंतराल का साहित्य,
अंतराल में है रचित वृहद।
‘विद्; धातु से बना वेद,
अर्थ़ जानना या रहा જ્ઞાन॥
आरण्यों में श्रृजित मंत्र का,
चिंतन मान पठन गायन॥
निर्जन वनमें ब्राह्मण साहित्य,
बाद आरण्यक कहलाए मान।
बाद आरण्यक भाग अंतिम,
दार्शनिक विषय वेदांत जानो॥
वेदांत का अर्थ होता है सुनें,
वेदों का अंत वा समापन।
आत्मा परमात्मा प्रकृति व्रह्म,
मोક્ષ कर्म मृत्यु माया विचार।
वीजारोपण જ્ઞાन मार्गी होता,
साहित्य भारतीय मार्ग જ્ઞાन॥

सूक्त ૠचाओं का संकलन,
‘मंगल’संहिता है कहलाती।
भाग चार हैं वेद के ‘तार’,
जिसे संहिता, व्राह्मण और,
उपनिद, आरण्यक है जान।
मंत्र ૠचाओं का જ્ઞાन जगा,
श्रुति और स्मृति पहचानो।
पुरखों से प्राप्य यह वंशबाद,
वेद कंठस्थ करो पुण्य जानो।
देवता विशेष को पद्य मंत्र,
यही रहा है कारण जिसका।
नित्य, अपौरुषेय, शाश्वत,
और दैवीय જ્ઞાन है उसका।
वीजारोपण જ્ઞાन मार्गी होता,
साहित्य भारतीय मार्ग જ્ઞાन॥
देवता विशेष को पद्य मंत्र,
संहिताજ્ઞાन में चरितार्थ हुई।
संहिता के भाग हैं चार,
ૠक् ,सांम, यजु:,अथर्ववेद।
जो सम्मान से व्याप्त सदा,
संहिता मंत्र मूल सूचना देती।
सूक्त ૠचाओं का संकलन,
‘मंगल’ संहिता है कहलाती।

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