मेरे देश की दुर्दशा ( मिलावट कहाँ कहाँ ) – कवि विनय भारत

मुझे मेरे
देश की दुर्दशा
का पता
तब चला
जब एक नोनवेज होटल के बाहर लिखा था

यहाँ बकरे का

“शुद्ध” मीट मिलता हैं

हाय देश की

दुर्दशा

यहाँ भी मिलावट !

कवि विनय भारत