जा रही हूँ छोड़कर

जा रही हूँ छोड़कर
महफिल तुम्हारी
न दुःखाओ कलेजा
मेरी जिन्दगी से।
मैंने पढ़ा
क्या तुमने पढ़ा था,
ऐसा ही कुछ
उस नोट में लिखा था।
दुःखी थी बहुत
न इल्जाम था कोई,
माफी भी माँगी
सभी जनों से।
लिखती थी आगे
मेरे बच्चों को रखना
पढ़ाना-लिखाना
अब हाथ है तुम्हारे।
जा रही हूँ छोड़कर
महफिल तुम्हारी
न दुःखाओ कलेजा
मेरी जिन्दगी से।

पसीने की बूँद(2007)
(ISBN-81-902906-5-7)
पुरस्क्रत-हिंदी अकादमी,
दिल्ली/Email-
lekhakmukeshsharma@gmail.com

poetmukeshsharma@gmail.com

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