गजनारी

महिला के क्षेत्रफल को देख
बदन पसीने-पसीने हो गया,
इस बुलडोजर को कौन चलाता होगा
सोचते-सोचते सो गया?

साँसें धौंकनी सी चल रही थीं
कुहनी और माथे पर
खरोंच लग रही थीं।
धर्मपत्नी ने पूछा-
‘ये चोट कैसी हैं?
क्या कल एक्सीडेन्ट हो गया था?’
उसे कौन समझाए-
एक्सीडेन्ट में बचने के आसार कहाँ थे?
परछाईं छूने के निशान
जहाँ-तहां थे।
मैं बोला-
कुछ न पूँछ
उसके कोमल बदन की
न कोई मिशाल है,
गजनारी की परछाईं का ये कमाल है।
ख्वाब में
खाट से पटक दिया,
मरने में देर कहाँ थी
शुक्र मना लौटा दिया।
इतना सुन वह
फेवीकॉल की तरह चुपक गई,
स्त्री के जिक्र मात्र से
भड़क गई।
बोली-
‘जब तक उस कलमुही का
नाम न बताओगे
खाना तो दूर
नित्यकर्म भी कच्छे में कर पाओगे।’
अपनी दयनीय स्थिति को देख
मैंने राज खोला
गजनारी की काया का वर्णन करते हुए
मैं बोला-
‘गजनारी के धड़ पर
मानवमुण्ड रख दिया हो,
सिर पर कालाझुण्ड
रख दिया हो,
कदम किसी पुल के पाये हों
वक्षस्थल में
मदरडेयरी के बूथ
समाये हों।
हाथ
गज की शुंड से बलिष्ठ थे,
ललाटबल महर्षि वशिष्ठ थे।
बिंदिया
रेडलाइट की तरह
चमक रही थी,
नयनोँ से
ग्यारह हजार वोल्ट की
चिंगारी भड़क रही थी।
कमर को देखकर लगता था-
मानो भूकंप से
पुरानी हवेली हिल रही हो।
कूल्होँ से पता चलता था
ज्यों गज से गजनारी
मिल रही हो।
धन्य है वह मानव
जो
इस सुशीलाचरण स्त्री का
सिन्दूर है,
विलक्षण हैं तेरे रंग
परमात्मा
तेरी पहुँच से मानव
दूर,
बहुत दूर है।

Leave a Reply