“पीताम्बर बड़थ्वाल”

क्यों देश इतना आज हलकान हो रहा है।
एक छोड़ दूजे के वास्ते कुर्वान कर रहा॥
जिन्दगी तो एक सी सबकी हुआ करती।
फिर भेद भाव ले क्यों मुल्तान हो रहा॥
संकीर्णता में हमने खुद खोया बहुत है।
संत साहित्य का शिषर बीरान हो रहा॥
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हिंदी का मान बढ़ाने, निकला संत पीताम्बर।
विद्या प्राणायाम पारखी, तंत्र – मंत्र साधना कर॥
झेला झंझावातों को पर,हिंदी का मान बढ़ाया।
विश्वम्भरड पीताम्बर अम्बर , साहित्य सुझाया॥
अंग्रेजी – अंग्रेज देश पर, नौकरी ना भरमाया॥
नहीं काम ‘निर्गुण’ पे होता,’सगुण’ सबका सहारा।
भारत अंग्रेजों की दासी,संत साहित्य में छाई उदासी॥
गढ़वाली आया ललकारा,अमर कोश का જ્ઞાन निखारा॥

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