आग लगाता हूँ

जिस शरीर मेँ प्राण नहीं, वो इंसान नहीं होता।
जिस इंसान मेँ वाणी ना हो, वह प्राण नहीं होता।
जिस वाणी मेँ आग ना हो, वाणी नहीं होती।
जिस अग्नि मेँ ताप ना हो, आणी-जाणी नहीं होती।
जो ताप किसी को खरा ना कर दे, मात्र जलन होता है।
सोना भी तो कुन्दन आग से गलने पर होता है।
मैं ऐसी ही अग्नि का वाहक, जलता और जलाता हूँ।
सत्य की आग बुझने न दूंगा, मैं वाणी से आग लगता हूँ।।

मनोज चारण
मो. 9414582964

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