फिर फिर का ये खेल

फिर फिर बदले लोग बाबरे,
फिर फिर बदली शैली भी,
फिर फिर बदला शासन प्यारे
फिर फिर चादर मैली भी।
फिर फिर देख रहा मैं आँसू,
फिर फिर नयनोँ से झरते हैं,
फिर फिर कोई जनक-लाड़ली
खेल रही अठखेली भी।
फिर फिर होता खेल अनूठा,
फिर फिर करुणा का सागर,
फिर फिर कोई विधवा रोऐ,
फिर फिर नार नवेली भी।
फिर फिर अपने नयन तेज कर
फिर फिर नार संवरती है,
फिर फिर कोई राक्षस बनकर
मार रहा नर डेली भी।
फिर फिर स्त्री पुष्प-वाटिका,
फिर फिर कान्हा की करताल,
फिर फिर स्वांग विपत्ति-पीड़ा
बदल रहे कटु शैली भी।
फिर फिर का ये खेल मगर फिर,
फिर फिर कैसे आता है,
फिर फिर अर्पण और समर्पण,
फिर फिर बंधन फेरी भी।
फिर फिर बदले लोग बाबरे॰॰॰

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