जब तू हँसती

(धर्मपत्नी कपूरी शर्मा
के लिए समर्पित)
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जब तू हँसती सुंदर लगती,
खिल जातीं दो कमल-पंखुड़ी,
जब तू हँसती-
संग हँसी के सहचर तेरे,
कंपित नयन पेट के कंपन,
अनहद स्म्रति,कपोल वलय,
अरु हाथों का अविरल अभिनय
जब तू हँसती-
जड़ता का उल्लास उभरकर,
चहंके मस्तक मध्य हंसे मन,
रहे न जीवित मुक्ति का स्वर
संगठित,सुस्मित भाव उभरती
जब तू हँसती-
कुत्सित वर्णन अन्तर्तम का,
समरसता का शांति-निकेतन
अन्तर और निरन्तर पथ दो,
दोनों पथ प्रकाशित करती,
जब तू हँसती-
हाय विधाता अधिवास न निश्चित,
ना जीवन की गति सुनिश्चित
उस स्त्री की कोख व्यवस्था,
कारण सुक्रत रूप उभरती,
जब तू हँसती-
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