दागे-पलंग

1-
आतिशकदा लगता है
दागे-पलंग आखिर,
जब दो दिलों के दरम्यां
बेमुद्दआ बगावत हो।
(कफ़न का बाजार)

2-
उसकी किसी बात का
मैं क्यों बुरा मानूं,
शायद दिलों के जाम में
कम रही शराब।

3-
आशिकोँ की बात का
कैसे यकीं कोई,
दिल की अगर बात तो
दर्द से रिश्ता।

4-
हमने गमे-इश्क में
जाते हुए उनको,
बेबसी के हाल पे
रोते हुए देखा।

5-
मैं रसाइल में अगर
छप गया होता,
वो सामने करके नजर
पढ़ती न क्या मुझे?

6-
क्या नहीं बिकता
इस शहर में यारब,
मिले खरीददार तो
ईमान का सौदा।

7-
बाबत उनसे इश्क की
पूछा किए जो हम,
मुस्कुराकर यूँ कहा
बोला कीजिए कम।

8-
गई बात तो गवाहों का
क्या करोगे यारब,
गमे-दिल को सताओ तो
मानो उनकी बात।

9-
ज़नाज़ा फिर वहीं निकला
जहाँ तकदीर रूठी थी,
जुबां से फिर वही खन्जर
दिवाली इसको कहते हैं।

10-
सनद रहे
न कोई मुसाहिब तू,
मंजिलें और भी हैं
कारवाँ के लिए।

lekhakmukeshsharma@gmail.com/9910198419

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