सर,सरासर खून है

1-॰
कूदकर छत से मरी,
क्यों कहता है ये खून है?
कुछ नहीं ये खुदकुशी है,
पागलपन अरु जुनून है।
कैसा जुनून जो मौत तक,
अपना सफर तय कर चला?
मत कहो इसे खुदकुशी,
सर,सरासर खून है।

2-
चुनाव में लोकतंत्र का
माहौल बदल जाता है,
पियक्कड़ शराबी पीकर
किस कदर बदल जाता है,
कुचल देता है मर्यादा
अपने ईमान की दोस्तो,
गुंडे,मवाली,भू-माफिया को
गांधी,जवाहर कह जाता है।

3-
दागे-पलंग तो नहीं
मेरे इश्क का जबाब,
मेरे मिजाज को
करवट बदलना काफी,
खन्जर घोंप गर न मरे
जुबां से आशिक,
मरने वाले को
नजर का बदलना काफी।

4-
जिन्दगी उश्शाक की
जाती रही जान से,
माशुक ने नकाब से
देखा नहीं एक बार,
जख्म था उसी का
मलहम उसी के पास,
दौड़ जाती रगोँ में
तर्जे-खूं एक बार।

5-
कहाँ वो दुनियां कि दिखे
जन्नत नकाब में,
इश्क था तर-ब-तर
मगर था शराब में,
खुशामदीद कहने का
वक्त ही कहाँ,
आमद बहार की ओ
पैरहन ज़हराब में।

शब्दार्थ-
1-उश्शाक/प्रेमी
2-ज़हराब/विषजल
3-पैरहन/पहनावा
4-तर्जे-खूं/रक्त की तरह
5-दागे-पलंग/बिस्तर का झगड़ा

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