जड़ ने पूछा वृक्ष से


जड़ ने पूछा वृक्ष से एक दिन

हे वृक्ष,
हुई तुम्हारी धृष्टता कैसे, हुआ तुम्हारा साहस कैसे,
धर के अपने पाँव आज तुम , खड़े मेरी छाती पर कैसे ।

जिस घमंड से आज हिलाते सरपट, तुम अपनी शाखाएँ हो,
जड़ भी तो हैं मित्र तुम्हारी, यह तुम क्यों बिसराये हो ।

रह कर स्वयं मृदा मे, तुम तक जल पहुंचाती थी,
मैं तो हूँ अदृश्य स्वयं, पर तुम्हे देख इतराती थी ।

तुम पर जब जब फल आये, या पुष्‍प हुए थे शोभित,
सारे पक्षी हुए आकर्षित, और हुए तुम मोहित ।

नन्हे बाल कंधों पर छाड़कर खींचे कटी पतंग,
झूला बांधे, चक्कर काटे, खेले लुका छुपी भी संग ।

तुम्हे मिला वरदान में सुन्दर पुष्‍प लताओं का सहवास ,
मुझे मिला हैं श्राप कदाचित, जो करते भुजंग मुझमें वास ।

रखना याद यह मित्र मेरे, जब तुम बूढ़े हो जाओगे,
शाखाओं पर ना होंगे पत्ते, फल भी ना तुम पाओगे,
पक्षी छोड़ घोंसला अपना, कर जाएँगे दूर पलायन,
और निवास करेंगे तुम पर गिद्ध, प्रेत और डायन ।

अपने उपर दंभ करे जो वो हारे सबका का विश्वास
अभिमान हैं सबसे घातक, करता जो स्वयं का नाश ।।

एक मित्र ने दूजे मित्र को बोले कड़वे बोल,
वृक्ष जो केवल मौन था अब तक, बोला आंखें खोल ।

हे जड़,

एक बीज से हम हैं जन्मे, एक हमारा नाता हैं,
एक पिता से हुई उत्पत्ती, एक हमारी माता हैं।

मत मानो हीन स्वयं को, समझो तुम अपना वर्चस्व,
भिन्न हमारे कार्य हैं किंतु दोनो का हैं एक महत्व।

अभिमान हो कहती जिसको, वो हैं केवल भ्रम तुम्हारा,
फल, पुष्‍प, छाया देना तो हैं केवल कर्तव्य हमारा।

तुम ही देती मुझको पोषन, तुमसे मिलता जल मुझको.
मित्र तुम्हारा हूँ मैं, तुमसे ही मिलता बल मुझको।

तुम बढ़ती धरती के अंदर, मेरा होता नभ मे विस्तार,
दिशा अलग हैं अपनी फिर भी, मित्र तुम ही मेरा आधार।

यदि करोगी ईर्ष्या मुझसे, मैं भी यह कह सकता हूँ,
तुम करती विश्राम पाताल मे, मैं धूप में जलता हूँ।

तुम रहती सुरक्षित भीतर, बाहर रहता मैं भय के साथ,
रौंदा गया जब था एक पौधा, बनकर वृक्ष कटवाएं हाँथ।

तुम्हें क्षती हो कभी यदि तो, मैं भी ना रह पाउंगा,
तुम फिर भी रह जाओगी “जड़” जब मैं कटवाया जाऊंगा।

तब देखेंगे जड़ तुम किस पर क्रोध दिखाती हो,
मेरी “जड़” तो तुम ही हो हे जड़, यह क्यों भूल जाती हो।

Jad ne poocha Vriksha se

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