कैसे…?

माना सभी हैं यहां अकेले,
पर सृष्टिचक्र को कैसे भुलायें?
कैसे कह दें मैं नवसृष्टि का प्राणी,
नवजीवन है इस वसुधा पर।
कैसे कह् दें “कोइ नहीं मेरा”?
जो है बस इक सपना है.
कैसे कह दें यह जीवनलीला ,
मृगत्रुष्णावत इक क्रीडा है?
यही सोच सखे!! याद सताये-
है अपनों की घरवालों की।
यही सोच………..

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