काबे जाकर भी

1-
काबे जाकर भी
क्या करोगे ‘मुकेश जी’आखिर?
फ़जल से खुदा के
है जन्नत दो आँखों के नसीब।

2-
मुद्दआ बहुत हैं
बाइसे-ताखीर में लेकिन,
तुम्हें क्या चाहिए
जिन्दगी के लिए?

3-
करना लिखा सलाम और
तकदीर को कोसें,
बेबसी के जाम का
घूंट पी लिए।

4-
श्री,श्रीमान,जनाब के
शब्द की बारूद,
जल उठी जब जल गया
उस नाम का चिराग।

5-
कुर्बानियाँ देते हुए
हमवतन हमलोग ने,
सोचा न होगा इस तरह
नीलाम होंगे हम।

6-
दर्द कहाँ कि निकलें
दो अश्क उनके,
बेवजह पीटते हैं
जिगर अपना।

7-
किसी का कुछ न बिगड़ेगा
जां गर चली जाए,
वजह से काफ़िरों की
हम खुदाया हो नहीं सकते।

8-
देखूं वो शक्ल तो
आँसू छलक आएं,
बहुत रुलाया हो
खुदा ने जिसको।

9-
पलंग ही निकला
दागे-पलंग आखिर,
क्या हो मजमूं
मुद्दआ का बता?

10-
ज़हराब है दरीचा
हुस्ने-शिकन का’मुकेश’,
गर हो अंजुमन में
अदृ की रौनक।

11-
तमहीद में होती है
हर बात लेकिन,
नीलाम हैं फिर भी
नुस्खा-ए-इबादत।

12-
तुमको अगर कुछ मिल रहा
तो मार के लूटो,
शेष कुछ बाकी नहीं
अब खुदा के हाथ।

शब्दार्थ-
1-बाइसे-ताखीर/विलंब का इंतजार
2-दागे-पलंग/पलंग का झगड़ा
3-ज़हराब/जहर
4-हुस्ने-शिकन/सिलवटों की सुन्दरता
5-अदृ/प्रतिद्वंदी

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