अधूरी नींद

तन्हा है दुनियाँ की भीड़ में हम
ना ठिकाना, है मंज़िल की तलाश में हम
मिलेगा कभी तो खोया संसार हमारा
पल-पल इसी ख़्वाब को सजोये हुए
अभी नींद से जागे नहीं है हम..

समझा था जिसे अपना सहारा
छोड़ चला वो हमें बेसहारा
किसी के साथ चलने का जज़्बा लिए
परछाइयों को साथ लिए जिए जा रहे है हम
अभी नींद से नहीं जागे है हम..

ठोकरों में डाल रेत का वो घर
सपनो की ऊंची उड़ान का वो दर
जी रहे है सपनो के साथ आज भी
किये अपनी आँखों को थोड़ा सा नम
अभी भी नींद से नहीं जागे है हम..

ख्वाब पूरा होगा, इस बात की आशा
वो रुस्वां ना कर दे इस बात की निराशा
प्यार तो सभी करते है दुनियाँ में
कोई थोड़ा ज्यादा, कोई थोड़ा कम
अभी भी नींद से नहीं जागे है हम..

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