“दर्द रोटी का”


रोटी का दर्द बढ़त जात बड़े बड़े लोक पाल,
छी छी छी छी करैं लोग छाती उकसी जात।
बार बार पाप का घेरा दु:ख धरे हे रहि जात,
छोरि छोरि बंधन फेकत नैन मेरो तनि जात॥
धू धू धू धू जरि लोक रहिहैं ऐसो गर बिचार,
चमक चादनी चुरैहैं चित बरखा न अधियार।
मुँह की लाली कामी- कामिनी- विजित- नर,
थूकत खेखारत हौ बिचारत सगरो सकल संसार॥

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