युद्ध वीर-2

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पीछे ना परैगो कबौं परम- उमंग- भरो,
रण रंग-रंगो दंग करिकै पधारैगो।
बार बार धूँआधार कठिन समर करि,
कीरति अपार या धरा पर पसारैगो।।
‘हरिऔध’ बैरिन को उदर बिदारि दैहे,
लात मारि मारि आँत अरि की निकारगो।
जाकी करतूत मैं लगी ना छूत एकौ बार,
राजपूत-पूत भूत सिर को उतारैगो।।

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