युद्ध वीर

धूरि मैं समैहैं ओल के समान गिरि’
टूक टूक ह्वैहैं तोप बार बार टनकी।
घोर घमासान बीरता की धूम धाम ह्वैहैं,
धीरता रही जो बनी धीरन के मन की।।
‘हरिऔध’ बिरद निबाहत बिरदधारो,
बात अबिदित है न बात-भरे तन की।
बर बीर छिति माहिँ छोरत अछूतो जस,
सुधि हूँ न लेत छिदी छाती के छतन की।।(संकलन)

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