दौड़

एक समय था जब
खुद से पीछे छूट जाने के भय से
दौड़ते रहते थे हम
और जब मिलते थे खुद से
खिल उठते थे
चांदनी रात में चांद की तरह
झरता था मधु
अंतस में

अब आगे निकल गए
दूसरों के पीछे दौड़ते रहते हैं
इस तरह खुद से इतना दूर
निकल जाते हैं कि
जीवनभर हाँफते रहते हैं
और अमावस की,स्याही
टपकती है
अंतस के झील में ।

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