उत्तर-कथा

माँ का आँचल था
सिर पर आशीर्वाद की जगह

पिता की हथेली थी
दिमाग में जीवन विवेक की जगह

पत्नी का समर्पण था
हृदय में प्रेम की जगह

भाई का बन्धुत्व था
बाजुओं में ताकत की जगह

बहन का स्नेह था
निगाहों में रौशनी की जगह

दोस्तों का साथ था
दिल में दिलासों की जगह

इतना सबकुछ था उसके पास लेकिन
सिर ढकने के लिए छत नहीं थी
रोज जलनेवाला चूल्हा नहीं था
ऐसे कपड़े नहीं थे
जिनको पहन कर वह सभ्य दिखे

सभ्य समाज का वह असभ्य नागरिक था

अपनी इस जिल्लत भरी जिन्दगी से ऊबकर
उसने आत्महत्या कर ली

उसकी मौत पर जश्न मनाया गया
घर-परिवार-आस-पड़ोस सारे लोग
शामिल थे इस खुशी में

वह शराब की एक बोतल में सिमट कर बैठा हुआ
सुबक रहा था अपनी मौत पर
हिम्मत जुटा रहा था
मौत के बाद का जीवन जीने के लिए

सीख रहा था आलीशान बँगले में रहने का सलीका
जला रहा था उस चूल्हे को
जो बिना भूख के भी जलता था
कपड़ों के इतने बडे़ अम्बार में
उतरने जा रहा था कि
रोज नए पहने तो खत्म न हों
नगर के सभ्य समाज की सूचियाँ
संशोधित हो रहीं थीं

सब जगह उसका नाम था
वह कहीं नहीं था
वह तो मर गया था ।

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