सभ्यता के अन्तिम दिनों में

उनके पास
कमजोर नसों की सूची होती है
उनकी ही भाषा में
सारे धर्मग्रन्थों का अनुवाद होता है
विचारों के जीवाश्मों को खोद-खोदकर
वे अपने लिए खोह बनाते हैं
सभ्यता के अन्तिम दिनों में
वे सबसे ज्यादा सक्रिय होतें हैं

वे रूप धरते हैं तरह-तरह के
प्रेमिकाओं की तरह हृदय में दाखिल होते हैं
पिता की तरह उंगलियों को थाम लेते हैं
माँ की तरह बहते हैं
दिल से दिमाग तक

सभ्यता के अन्तिम दिनों में
उनको पहचानते हैं सब
सब करते हैं उनसे घृणा
चर्चाएं गर्म होतीं हैं उनके खिलाफ
फिर भी उनकी ही प्रजाति
सबसे ज्यादा फलती-फूलती हैं ।

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