नदी जैसी धार

हँसना चाहता हूँ
इतनी जोर की हँसी चाहिए
जिसकी बाढ़ में बह जाए
अन्दर की सारी कुण्ठाएं

रोना चाहता हूँ
इतनी करुणा चाहिए कि
आँसुओं की नमी से
खेत में बदल जाए सारा मरूस्थल

चिल्लाना चाहता हूँ
इतनी तीव्रता चाहिए जिससे
सामने खड़ी चट्टान में
दरार पड़ जाए

बात करना चाहता हूँ
मुझे वायु जैसे शब्द चाहिए
और नदी जैसी धार ।

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