तहखाना

कुछ दिन पहले,
मस्तिष्क की देहलीज से चलते-चलते,
जब पहुंचे तहखाने में अपने दिल के,
पाया इक पोटली में बंद तेरी यादों को…

कुछ यादें थीं जो इक कोने से झाँक रहीं थीं,
कुछ यादें थीं जो बंद पोटली से पुकार रहीं थीं,
कुछ यादें थीं जो अपनी राहें मोड़ चुकी थीं,
कुछ यादें थीं जो सिसक-सिसक दम तोड़ चुकी थीं….

इक अरसा पहले बाँध दिया था इक पोटली में हर बीते पल को,
और छोड़ गए थे इस तहखाने में, अपने आज और कल को…

कोई इल्म नहीं था की दोबारा बढ़ जायेंगे कदम इस ओर,
और टूट जाएगी खुद पर से हर पकड़, हर ज़ोर…

गम नहीं गर जहान फूक भी दे इस बाहर की दुनिया को,
यहां तो सिर्फ मेरा जिस्म रहता है…
पर भूल कर भी न जाना इस तहखाने में,
यहां पोटली में बंद, मेरा छोटा सा दिल भी रहता है…

— गरिमा मिश्रा

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