एक उर्म के बाद

एक उर्म के बाद सब मिलते हैं
जैसे नदियों के लिए समंदर खुलते हैं
छूट जाता है सब छोटा
बड़े हो जाते हैं हम
याद आती है सारी गलतियां
झगड़े, रूसवाईयां
भूलकर पुराना फिर नया सिलते हैं
एक उर्म के बाद सब मिलते हैं

जिनसे जिरह थी
जो सुहाते भी नहीं थे
देखकर मुंह फेर लेते थे
बांधकर रख लिया था
जिनको गंठरियों में
तंग दिल अब उनके लिए खुलते हैं
एक उर्म के बाद सब मिलते हैं

तपी उर्म जिरह की आग में
खोया बहुत छोटे बड़े के राग में
सख्त हुए कि भेद ना पाए कोई
बिता दी जिंदगी दौड़भाग में
जो लोहे की तरह थे कभी
रिश्तों के ताप से पिघलते हैं
एक उर्म के बाद सब मिलते हैं
जैसे नदियों के लिए समंदर खुलते हैं

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