“खंडहर “


भूख ने व्याकुल किया।
खंडहर होता सब दिखता रहा।।
पेट खाली कर गया।
तन-मन रंगोलियाँ खेलता रहा।।
ख्वाबें सजोये ता उम्र।
ओ ओर छोर मुस्कराता रहा।।
पैदल चला करता।
वह स्पलेन्डर से जाता रहा।।
विश्वविद्यालय की ड्योढ़ी।
पर जाकर शीश झुकाता रहा।।
झोली खोली मंनतों ।
की दर बदर ठुकराता रहा।।
अक्ल का ताला बंद पर।
गीत फलक पर लाता रहा।।
कल की ओर निहारे बठै।
रात-दिन ज्यों बिताता रहा।।
समय सत्य निहारता।
कौन!नभ तक जाता रहा।।
अपनेंअपनेंसपनें जीनेके।
रह-रह अक्ल बतलाता रहा।।
आँखें धुधली उतरा ऐनक।
घोर अंधेरा पर मुस्कराता रहा।।
अमावस की घिरी रातें।
को बढ़कर दीप जलाता रहा।।
अक्ल नें इन्साफ किया।
मुखरित हो गीत गाता रहा।।