बेटी

वो मेरी उम्मीदों से निकली किरण है
वो साहस है
मेरे ख्वाबों को सच करने का
वो मेरे टूटे पलों में जन्मी ताकत है
वो ज़िंदा स्पर्श है
मेरे नाबिना एहसासों का
जब मैं कौतुहल का समंदर का
वो उन लम्हों की तस्वीर है
वो मेरे उजले दिनों का प्रकाश है
वो रेगिस्तान में
ओस की बूंद से जन्मा पलाश है
वो मेरी सिकुड़ती पुतलियों में जागी अभिलाशा है
वो मेरी अपनी भाषा है
वो धैर्य है
मेरे खोए सपनों के पुनर्जागरण का
वो अलंकार है
मेरे अपने व्याकरण का
उसकी उंगलियों मे रफ्तार मेरी है
उसके हर हर्फ में परवाज़ मेरी है
वो मेरे सुलगते बुझते अरमानों के
बाद का आना है
वो महज़ सोच नहीं
सच की इबारत का गाना है
वो गहरी रात के बाद की
सिंधूरी आभा है
वो प्रार्थना में जुड़े हाथ
घंटियों की गूंज
मंत्रों के बीच बंधा
दरवेश का धागा है।

वो हरियायी धरती
नदी की कलकल
समंदर का शकूर है,
वो टूटती सांसों में समाई
ज़िंदगी भरपूर है
वो आस है, वो पास है
वो खुला आकाश है
वो इस बेनूर जहां में बात अनूठी है
नाम मिनी है उसका
वो मेरी बेटी है।

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