सोना प्रकाश

सुबह सुबह
सोने के कटोरे से निकलकर
सोने की धूप
वृक्षों को कर देती है सोना सोना
आंखों में भरकर पंहुचती है अंदर
रंगों में भर देती है आफताब
चमक उठता है बगीचा
दमक उठते हैं नीम, सेमल, कचनार
संसृति पर सुबह का हो जाता है विस्तार
खिल उठती है धूप
जाग जाते हैं धरती आकाश, समंदर
आंखों में भरकर पंहुचती है अंदर
पुलकित हो जाता है अलसाया अंतर
रेशा रेशा हो जाता है सोना, सोना प्रकाश
मुस्कराता हूं
कहता हूं सुप्रभात।

Leave a Reply