“माँ तारिणी”

रथ पर गंगा पथ पर गंगा बूँद-बूँद को तरस रहे हम?
बच्चे-बूढ़े महिला-पुरुष अधिकारी-मंत्री हरष रहे सब।
माला फूल पालोथिन कचरा जगह जगह ठूँस रहा जन।
हर-हर गंगे जय-जय गंगे डगर-डगर गूँज रहा जन॥
विश्वम्भर खड़े हो गये ले पुष्प की माला मन ही मन।
शहनाई औ गान सुन झूम उठा सारा विद्वत मन जन॥
शासन-सत्ता मगन हो चला होवे कलश का दरस परस।
सद्भाव की अलख जगाकर जंगमवाड़ी अद्भुत मोहा मन॥
झाँकी झाँक झरोखे झलमल-झलमल झलफल झलकनि।
गंगा की सफाई संकल्पों में गठरी बाधा मुखरित सुजन॥
ढ़ोल नगाड़ा ताशे डमाडम नूतन रंग नव उनंग तरंग मन।
हरहर महादेव बम बम गंगा लहरें लहरे दिल काशी जन॥
साधु संत व्यापारी नेता बच्चे करते दिखते खैर मकदम।
जाह्नवी संकल्पों का पोस्टर महिलाएँ निकलीं ले बन ठन॥
खाका खींचा फैक्टरियों का कचरा गिरता मिलियन टन।
गाँव-शहर के नाला- नाली माँ का करता मलिन मन॥
वंद!बैंड-मृदंग तुरही पखाउज पुरी और विशिष्ट जन-मन।
रहे साध सभी साधना कहो गंगा होगी फिर निर्मल मन॥

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