अब कहाँ गनीमत है?

अब कहाँ गनीमत है?

अब कहाँ गनीमत है?
कि पृथ्वी पर अब
न हवा मुफ्त है
न पार्क समुन्दर मुफ्त है..

अब तो बड़ी बड़ी अट्टालिकाओं ने रोक लिया है हवा को
और मुनाफाखोरों ने
अपने कारखानों से निकलते धुएं से
जहरीली बना दिया है हवा को
और हम चुकाते हैं
उसकी कीमत डाक्टर की फीस और दवा की कीमत देकर..

वे सारी जगह जिन्हें पार्क कहते है
अब मुफ्त नहीं हैं
देनी पडती है उसकी कीमत टिकिट खरीदकर
या कारपोरेशनों को टेक्स चुकाकर..

जो लगते हैं मुफ्त हैं
वहां कुत्तों का बसेरा होता है
या बैठे रहते हैं वहां आवारा जोड़े
जिन्हें कभी एक नहीं होना है..

हमारे शहरों में अब
पार्क नहीं सजाये जाते
श्मशान सजते हैं
और इतमीनान और सुकून के साथ
हम निपटाते हैं अपने सगों और मित्रों को…

वह साफ़ समुद्र जो छूने लायक है
उसे और उसके तट को बेच दिया है सरकारों ने
धन्नासेठों को पर्यटन और विकास के नाम पर
वहां प्रवेश की टिकिट लगती है
जिसकी कीमत
हमारे दो वक्त के आलीशान भोजन से
ज्यादा होती है…

और सूर्योदय और सूर्यास्त
वह तो अब बहुमंजिला इमारतों के लिए
सुरक्षित हो गया है..
हमें तो सूर्य की तपिश झेलनी पड़ती है
जब वह आता है हमारे सर के ऊपर..

ज्यादा वक्त नहीं गुजरा है
पर, हवा, पार्क, समुद्र , सूर्योदय और सूर्यास्त
हमारे लिए हो चुकी हैं
गुजरे जमाने की चीजें…

अब हम विटामिन डी सूर्य से नहीं
केपसूल में लेते हैं
शुद्ध हवा के लिए नाक पर कपड़ा लपेटकर चलते हैं
पार्क में कुत्तों और शोहदों से डरते डरते जाते हैं
और सूर्योदय और सूर्यास्त
गनीमत है
वह हमें टीव्ही दिखा देता है…

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