ग़ज़ल-आईना और आँसू

अजनबी से अजनबी रही
ज़िन्दगी एक पहेली रही !

मतलब से जिसने कभी देखा
आईने में आईने सी रही !

उन से ही था रिश्ता मेरा
दोस्ती अब न ऐसी रही !

आप ही के न आने से यहाँ
आज महफ़िल अधूरी रही !

ज़िन्दगी पर एतबार कैसे
मौत ही मंज़िल मेरी रही !

पलकें “आँसू” से भीगने लगी
ज़िन्दगी में बस नमी रही ॥

जैन अंशु डी० आँसू

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