जब से होश सम्भाला है..

जब से होश सम्भाला है..
खुद को जहानत कि दुनिया में पाया है..

इस जंहा में कदम रखने को ..
ना जाने कितने अपनों को मेने ठुकराया है

बड़ी हसरत थी दुनिया के उसूलो से रुबरु होने कि..
मगर हकीकत में, खुद को कंही गिरी नजरो में पाया है

बयां करने चला था खुशियाँ दुनिया को इस कलम से..

मगर हकीकत में, आँशु-ए-दर्द को ही पन्नो पे पाया है

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