गुड्डे की शादी

मुख से खिली खिली वो
मन ही मन गा रही थी
हशती कभी, कभी बतलाती
टूटे दांत दिखा रही थी

गोल गोल आँखे उसकी
जैसे रहमते बसी हुई
एक छोटी सी तितली
खुद के जाल में फसी हुई

पत्तों के बना गलीचे
फूलों से सजा रही थी
और खिड़की दरवाजे
तिल्लियों के बना रही थी

जब वो घर के अंदर
कुछ छुपाने लगती थी
तो उसकी दो चोटियां
गालों पर गिरने लगती थी

मिट्टी के सने हाथ
कितनी धूल लिबाज पर
पर वो बेपरवाह कृति
हँश देती हर जवाब पर

कागज़ का बना कोना
शंख शिखर पर लगा रही थी
वो एक अनजान मुसाफिर
मनमौजी चलती जा रही थी

नन्ही सी ये नजाकत
दुनिया नई बना रही थी
एक छोटी सी बच्ची
गुड्डे की शादी करवा रही थी

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