फागुनी हवाओं के पीताम्बरी फूल

पके हुए खेतों के आर पार
बसंती हवाओं से जूझते
अलग अलग तने खड़े
सिहरती लताओं से घिरे
फागुनी हवाओं के फूल
क्या नाम विशेष दूं इन्हें
किस के प्यार की कहूं इन्हें धरोहर
तपी हुई मिट्टी पर झलक रहे हैं इन पर
मौसम के स्वर्ण चूर्ण
बयारों के आते-जाते झोंके हैं इधर उधर
गूँज रही दूर दूर पेड़ों से टकराती सीटियाँ
शून्यों के महलों के आसपास धूपों के सजे हुए मेले हैं
ऐसा है
फागुनी जश्न यहाँ

छाहों की कमरों से सरक सरक जाती बादल के अक्सों की रजत रश्मि करधनियाँ
हठीली हवाएं लौट लौट आती हैं
स्पर्श कर भर लेती हैं
अंकों में पौधों की शाखों को
जड़-तल तक
शर्मीली पत्तियाँ
मुंह ढँक कर
एक एक कर झरती हैं
बिखरा कर केशरी सुगंधों को…
तल की इन घासों को
इस क़ दर खिलखिलाते
पहले नहीं
देखा था।

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